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الشعراء

हिन्दी Translation with Arabic Quran Text

हिन्दी العربية
1 ता, सीन, मीम। طسٓمٓ. ﴿1﴾
2 ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं। تِلْكَ ءَايَٰتُ ٱلْكِتَٰبِ ٱلْمُبِينِ. ﴿2﴾
3 शायद (ऐ रसूल!) आप अपने आपको हलाक करने वाले हैं, इसलिए कि वे ईमान नहीं लाते।[1]
[1] अर्थात उनके ईमान न लाने के शोक में।
لَعَلَّكَ بَٰخِعٌۭ نَّفْسَكَ أَلَّا يَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ. ﴿3﴾
4 यदि हम चाहें, तो उनपर आकाश से कोई निशानी उतार दें, फिर उसके सामने उनकी गर्दनें झुकी रह जाएँ।[2]
[2] परंतु ऐसा नहीं किया, क्योंकि दबाव का ईमान स्वीकार्य तथा मान्य नहीं होता।
إِن نَّشَأْ نُنَزِّلْ عَلَيْهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ءَايَةًۭ فَظَلَّتْ أَعْنَٰقُهُمْ لَهَا خَٰضِعِينَ. ﴿4﴾
5 और जब भी 'रह़मान' (अति दयावान्) की ओर से उनके पास कोई नई नसीहत आती है, तो वे उससे मुँह फेरने वाले होते हैं। وَمَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍۢ مِّنَ ٱلرَّحْمَٰنِ مُحْدَثٍ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهُ مُعْرِضِينَ. ﴿5﴾
6 अतः निःसंदेह उन्होंने झुठला दिया, तो शीघ्र ही उनके पास उस चीज़ की खबरें आ जाएँगी, जिसका वे उपहास उड़ाया करते थे। فَقَدْ كَذَّبُوا۟ فَسَيَأْتِيهِمْ أَنۢبَٰٓؤُا۟ مَا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ. ﴿6﴾
7 और क्या उन्होंने धरती की ओर नहीं देखा कि हमने उसमें हर उत्तम प्रकार के कितने पौधे उगाए हैं? أَوَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلْأَرْضِ كَمْ أَنۢبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍۢ كَرِيمٍ. ﴿7﴾
8 निःसंदे इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी[3] है। (परंतु) उनमें से अधिकतर ईमान लाने वाले नहीं थे।
[3] अर्थात अल्लाह के सामर्थ्य की।
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ. ﴿8﴾
9 तथा निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है। وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ. ﴿9﴾
10 और जब आपके पालनहार ने मूसा को पुकारा कि उन ज़ालिम लोगों[4] के पास जाओ।
[4] यह उस समय की बात है जब मूसा (अलैहिस्सलाम) दस वर्ष मदयन में रहकर मिस्र वापस आ रहे थे।
وَإِذْ نَادَىٰ رَبُّكَ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱئْتِ ٱلْقَوْمَ ٱلظَّٰلِمِينَ. ﴿10﴾
11 फ़िरऔन की जाति के पास। क्या वे डरते नहीं? قَوْمَ فِرْعَوْنَ ۚ أَلَا يَتَّقُونَ. ﴿11﴾
12 उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह मुझे डर है कि वे मुझे झुठला देंगे। قَالَ رَبِّ إِنِّىٓ أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ. ﴿12﴾
13 और मेरा सीना घुटता है और मेरी ज़बान नहीं चलती, अतः हारून की ओर संदेश भेज। وَيَضِيقُ صَدْرِى وَلَا يَنطَلِقُ لِسَانِى فَأَرْسِلْ إِلَىٰ هَٰرُونَ. ﴿13﴾
14 और उनका मुझपर एक अपराध का आरोप है। अतः मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार डालेंगे। وَلَهُمْ عَلَىَّ ذَنۢبٌۭ فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ. ﴿14﴾
15 (अल्लाह ने) फरमाया : ऐसा कभी नहीं होगा, अतः तुम दोनों हमारी निशानियों के साथ जाओ। निःसंदेह हम तुम्हारे साथ ख़ूब सुनने[5] वाले हैं।
[5] अर्थात तुम दोनों की सहायता करते रहेंगे।
قَالَ كَلَّا ۖ فَٱذْهَبَا بِـَٔايَٰتِنَآ ۖ إِنَّا مَعَكُم مُّسْتَمِعُونَ. ﴿15﴾
16 तो तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और कहो कि निःसंदेह हम सारे संसारों के पालनहार के संदेशवाहक हैं। فَأْتِيَا فِرْعَوْنَ فَقُولَآ إِنَّا رَسُولُ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿16﴾
17 कि तू बनी इसराईल को हमारे साथ भेज दे। أَنْ أَرْسِلْ مَعَنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ. ﴿17﴾
18 (फ़िरऔन ने) कहा : क्या हमने तुझे अपने यहाँ इस हाल में नहीं पाला कि तू बच्चा था और तू हमारे बीच अपनी आयु के कई वर्ष रहा? قَالَ أَلَمْ نُرَبِّكَ فِينَا وَلِيدًۭا وَلَبِثْتَ فِينَا مِنْ عُمُرِكَ سِنِينَ. ﴿18﴾
19 और तूने अपना वह काम[6] किया, जो तूने किया। और तू अकृतज्ञों में से है।
[6] यह क़िबती को क़त्ल करने की ओर संकेत है जो मूसा (अलैहिस्सलाम) से नबी बनाए जाने से पहले हो गया था। (देखिए : सूरतुल-क़स़स़)
وَفَعَلْتَ فَعْلَتَكَ ٱلَّتِى فَعَلْتَ وَأَنتَ مِنَ ٱلْكَٰفِرِينَ. ﴿19﴾
20 (मूसा ने) कहा : मैंने उस समय वह काम इस हाल में किया कि मैं अनजानों में से था। قَالَ فَعَلْتُهَآ إِذًۭا وَأَنَا۠ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ. ﴿20﴾
21 फिर मैं तुम्हारे पास से भाग गया, जब मैं तुमसे डरा, तो मेरे पालनहार ने मुझे हुक्म (नुबुव्वत एवं ज्ञान) प्रदान किया और मुझे रसूलों में से बना दिया। فَفَرَرْتُ مِنكُمْ لَمَّا خِفْتُكُمْ فَوَهَبَ لِى رَبِّى حُكْمًۭا وَجَعَلَنِى مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ. ﴿21﴾
22 और यह कोई उपकार है, जो तू मुझपर जता रहा है कि तूने बनी इसराईल काे ग़ुलाम बना रखा है। وَتِلْكَ نِعْمَةٌۭ تَمُنُّهَا عَلَىَّ أَنْ عَبَّدتَّ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ. ﴿22﴾
23 फ़िरऔन ने कहा : और 'रब्बुल-आलमीन' (सारे संसारों का पालनहार) क्या है? قَالَ فِرْعَوْنُ وَمَا رَبُّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿23﴾
24 (मूसा ने) कहा : जो आकाशों और धरती का रब है और जो उनके बीच है उसका भी, यदि तुम विश्वास करने वाले हो। قَالَ رَبُّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ. ﴿24﴾
25 उसने अपने आस-पास के लोगों से कहा : क्या तुम सुनते नहीं? قَالَ لِمَنْ حَوْلَهُۥٓ أَلَا تَسْتَمِعُونَ. ﴿25﴾
26 (मूसा ने) कहा : जो तुम्हारा पालनहार तथा तुम्हारे पहले बाप-दादा का पालनहार है। قَالَ رَبُّكُمْ وَرَبُّ ءَابَآئِكُمُ ٱلْأَوَّلِينَ. ﴿26﴾
27 (फ़िरऔन ने) कहा : निश्चय तुम्हारा यह रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, अवश्य पागल है। قَالَ إِنَّ رَسُولَكُمُ ٱلَّذِىٓ أُرْسِلَ إِلَيْكُمْ لَمَجْنُونٌۭ. ﴿27﴾
28 (मूसा ने) कहा : जो पूर्व तथा पश्चिम रब है और उसका भी जो उन दोनों के बीच है, अगर तुम समझते हो। قَالَ رَبُّ ٱلْمَشْرِقِ وَٱلْمَغْرِبِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْقِلُونَ. ﴿28﴾
29 (फ़िरऔन ने) कहा : निश्चय यदि तूने मेरे अलावा किसी और को पूज्य बनाया, तो मैं तुझे अवश्य ही बंदी बनाए हुए लोगों में शामिल कर दूँगा।‌ قَالَ لَئِنِ ٱتَّخَذْتَ إِلَٰهًا غَيْرِى لَأَجْعَلَنَّكَ مِنَ ٱلْمَسْجُونِينَ. ﴿29﴾
30 (मूसा ने) कहा : क्या भले ही मैं तेरे पास कोई स्पष्ट चीज़ ले आऊँ? قَالَ أَوَلَوْ جِئْتُكَ بِشَىْءٍۢ مُّبِينٍۢ. ﴿30﴾
31 उसने कहा : तू उसे ले आ, यदि तू सच्चे लोगों में से है। قَالَ فَأْتِ بِهِۦٓ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ. ﴿31﴾
32 फिर उसने अपनी लाठी फेंक दी, तो अचानक वह एक प्रत्यक्ष अजगर बन गई। فَأَلْقَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِىَ ثُعْبَانٌۭ مُّبِينٌۭ. ﴿32﴾
33 तथा उसने अपना हाथ निकाला, तो एकाएक वह देखने वालों के लिए सफेद (चमकदार) था। وَنَزَعَ يَدَهُۥ فَإِذَا هِىَ بَيْضَآءُ لِلنَّٰظِرِينَ. ﴿33﴾
34 उसने अपने आस-पास के प्रमुखों से कहा : निश्चय यह तो एक बड़ा कुशल जादूगर है। قَالَ لِلْمَلَإِ حَوْلَهُۥٓ إِنَّ هَٰذَا لَسَٰحِرٌ عَلِيمٌۭ. ﴿34﴾
35 जो चाहता है कि अपने जादू के साथ तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल[7] दे। तो तुम क्या आदेश देते हो?
[7] अर्थात यह उग्रवाद करके हमारे देश पर अधिकार कर ले।
يُرِيدُ أَن يُخْرِجَكُم مِّنْ أَرْضِكُم بِسِحْرِهِۦ فَمَاذَا تَأْمُرُونَ. ﴿35﴾
36 उन्होंने कहा : इसके तथा इसके भाई को मोहलत दें और नगरों में (लोगों को) जमा करने वालों को भेज दें। قَالُوٓا۟ أَرْجِهْ وَأَخَاهُ وَٱبْعَثْ فِى ٱلْمَدَآئِنِ حَٰشِرِينَ. ﴿36﴾
37 कि वे तेरे पास हर बड़ा जादूगर ले आएँ, जो जादू में बहुत कुशल हो। يَأْتُوكَ بِكُلِّ سَحَّارٍ عَلِيمٍۢ. ﴿37﴾
38 तो जादूगर एक निश्चित दिन के नियत समय पर इकट्ठा कर लिए गए। فَجُمِعَ ٱلسَّحَرَةُ لِمِيقَٰتِ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ. ﴿38﴾
39 तथा लोगों से कहा गया : क्या तुम एकत्र होने वाले[8] हो?
[8] अर्थात लोगों को प्रेरणा दी जा रही है कि इस प्रतियोगिता में अवश्य उपस्थित हों।
وَقِيلَ لِلنَّاسِ هَلْ أَنتُم مُّجْتَمِعُونَ. ﴿39﴾
40 शायद हम इन जादूगरों के अनुयायी बन जाएँ, यदि वही विजयी हों। لَعَلَّنَا نَتَّبِعُ ٱلسَّحَرَةَ إِن كَانُوا۟ هُمُ ٱلْغَٰلِبِينَ. ﴿40﴾
41 फिर जब जादूगर आ गए, तो उन्होंने फ़िरऔन से कहा : क्या सचमुच हमें कुछ पुरस्कार मिलेगा, यदि हम ही प्रभावी रहे? فَلَمَّا جَآءَ ٱلسَّحَرَةُ قَالُوا۟ لِفِرْعَوْنَ أَئِنَّ لَنَا لَأَجْرًا إِن كُنَّا نَحْنُ ٱلْغَٰلِبِينَ. ﴿41﴾
42 उसने कहा : हाँ! और निश्चय तुम उस समय निकटवर्तियों में से हो जाओगे । قَالَ نَعَمْ وَإِنَّكُمْ إِذًۭا لَّمِنَ ٱلْمُقَرَّبِينَ. ﴿42﴾
43 मूसा ने उनसे कहा : फेंको, जो कुछ तुम फेंकने वाले हो। قَالَ لَهُم مُّوسَىٰٓ أَلْقُوا۟ مَآ أَنتُم مُّلْقُونَ. ﴿43﴾
44 तो उन्होंने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकीं और कहा : फ़िरऔन के प्रभुत्व की सौगंध! निःसंदेह हम, निश्चय हम ही विजयी रहेंगे। فَأَلْقَوْا۟ حِبَالَهُمْ وَعِصِيَّهُمْ وَقَالُوا۟ بِعِزَّةِ فِرْعَوْنَ إِنَّا لَنَحْنُ ٱلْغَٰلِبُونَ. ﴿44﴾
45 फिर मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, तो एकाएक वह उन चीज़ों को निगल रही थी, जो वे झूठ बना रहे थे। فَأَلْقَىٰ مُوسَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِىَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ. ﴿45﴾
46 इसपर जादूगर सजदा करते हुए गिर गए।[9]
[9] क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया कि मूसा (अलैहिस्सलाम) जादूगर नहीं, बल्कि वह सत्य के उपदेशक हैं।
فَأُلْقِىَ ٱلسَّحَرَةُ سَٰجِدِينَ. ﴿46﴾
47 उन्होंने कहा : हम सारे संसारों के पालनहार पर ईमान ले आए। قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِرَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿47﴾
48 मूसा तथा हारून के पालनहार पर। رَبِّ مُوسَىٰ وَهَٰرُونَ. ﴿48﴾
49 (फ़िरऔन ने) कहा : तुम उसपर ईमान ले आए, इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ? निःसंदेह यह अवश्य तुम्हारा बड़ा (गुरू) है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। अतः निश्चय तुम जल्दी जान लोगे। मैं अवश्य तुम्हारे हाथ और तुम्हारे पाँव विपरीत दिशा[10] से काट दूँगा तथा निश्चय तुम सभी को अवश्य बुरी तरह सूली पर चढ़ा दूँगा।
[10] अर्थात दाँया हाथ और बायाँ पैर या बायाँ हाथ और दायाँ पैर।
قَالَ ءَامَنتُمْ لَهُۥ قَبْلَ أَنْ ءَاذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّهُۥ لَكَبِيرُكُمُ ٱلَّذِى عَلَّمَكُمُ ٱلسِّحْرَ فَلَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ۚ لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَٰفٍۢ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ. ﴿49﴾
50 उन्होंने कहा : कोई नुक़सान नहीं, निश्चित रूप से हम अपने पालनहार की ओर पलटने वाले हैं। قَالُوا۟ لَا ضَيْرَ ۖ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ. ﴿50﴾
51 हम आशा रखते हैं कि हमारा पालनहार हमारे लिए, हमारे पापों को क्षमा कर देगा, इस कारण कि हम सबसे पहले ईमान लाने वाले हैं। إِنَّا نَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لَنَا رَبُّنَا خَطَٰيَٰنَآ أَن كُنَّآ أَوَّلَ ٱلْمُؤْمِنِينَ. ﴿51﴾
52 और हमने मूसा की ओर वह़्य की कि मेरे बंदों को लेकर रातों-रात निकल जा। निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा। ۞ وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِىٓ إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ. ﴿52﴾
53 तो फ़िरऔन ने नगरों में (सेना) एकत्र करने वालों को भेज दिया।[11]
[11] जब मूसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के आदेशानुसार अपने साथियों को लेकर निकल गए तो फ़िरऔन ने उनका पीछा करने के लिए नगरों में हरकारे भेजे।
فَأَرْسَلَ فِرْعَوْنُ فِى ٱلْمَدَآئِنِ حَٰشِرِينَ. ﴿53﴾
54 कि निःसंदेह ये लोग एक छोटा-सा समूह हैं। إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ لَشِرْذِمَةٌۭ قَلِيلُونَ. ﴿54﴾
55 और निःसंदेह ये हमें निश्चित रूप से गुस्सा दिलाने वाले हैं। وَإِنَّهُمْ لَنَا لَغَآئِظُونَ. ﴿55﴾
56 और निश्चय ही हम सब चौकन्ना रहने वाले हैं। وَإِنَّا لَجَمِيعٌ حَٰذِرُونَ. ﴿56﴾
57 इस तरह हमने उन्हें बाग़ों और सोतों से निकाल दिया। فَأَخْرَجْنَٰهُم مِّن جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ. ﴿57﴾
58 तथा ख़ज़ानों और उत्तम आवासों से। وَكُنُوزٍۢ وَمَقَامٍۢ كَرِيمٍۢ. ﴿58﴾
59 ऐसा ही हुआ और हमने उनका वारिस बनी इसराईल को बना दिया। كَذَٰلِكَ وَأَوْرَثْنَٰهَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ. ﴿59﴾
60 तो उन्होंने सूर्योदय के समय उनका पीछा किया। فَأَتْبَعُوهُم مُّشْرِقِينَ. ﴿60﴾
61 फिर जब दोनों गिरोहों ने एक-दूसरे को देखा, तो मूसा के साथियों ने कहा : निःसंदेह हम निश्चय ही पकड़े जाने[12] वाले हैं।
[12] क्योंकि अब सामने सागर और पीछे फ़िरऔन की सेना थी।
فَلَمَّا تَرَٰٓءَا ٱلْجَمْعَانِ قَالَ أَصْحَٰبُ مُوسَىٰٓ إِنَّا لَمُدْرَكُونَ. ﴿61﴾
62 (मूसा ने) कहा : हरगिज़ नहीं! निश्चय मेरे साथ मेरा पालनहार है। वह अवश्य मेरा मार्गदर्शन करेगा। قَالَ كَلَّآ ۖ إِنَّ مَعِىَ رَبِّى سَيَهْدِينِ. ﴿62﴾
63 तो हमने मूसा की ओर वह़्य की कि अपनी लाठी को सागर पर मारो। (उसने लाठी मारी) तो वह फट गया और हर टुकड़ा बड़े पहाड़ की[13] तरह हो गया।
[13] अर्थात बीच से मार्ग बन गया और दोनों ओर पानी पर्वत के समान खड़ा हो गया।
فَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱضْرِب بِّعَصَاكَ ٱلْبَحْرَ ۖ فَٱنفَلَقَ فَكَانَ كُلُّ فِرْقٍۢ كَٱلطَّوْدِ ٱلْعَظِيمِ. ﴿63﴾
64 तथा वहीं हम दूसरों को निकट ले आए। وَأَزْلَفْنَا ثَمَّ ٱلْءَاخَرِينَ. ﴿64﴾
65 और हमने मूसा को और जो उसके साथ थे, सबको बचा लिया। وَأَنجَيْنَا مُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُۥٓ أَجْمَعِينَ. ﴿65﴾
66 फिर हमने दूसरों को डुबो दिया। ثُمَّ أَغْرَقْنَا ٱلْءَاخَرِينَ. ﴿66﴾
67 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर लोग ईमान लाने वाले नहीं थे। إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ. ﴿67﴾
68 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् हैl وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ. ﴿68﴾
69 तथा आप उन्हें इबराहीम का समाचार सुनाएँ। وَٱتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ إِبْرَٰهِيمَ. ﴿69﴾
70 जब उसने अपने बाप तथा अपनी जाति से कहा : तुम किसकी पूजा करते हो? إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦ مَا تَعْبُدُونَ. ﴿70﴾
71 उन्होंने कहा : हम कुछ मूर्तियों की पूजा करते हैं, इसलिए उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं। قَالُوا۟ نَعْبُدُ أَصْنَامًۭا فَنَظَلُّ لَهَا عَٰكِفِينَ. ﴿71﴾
72 उसने कहा : क्या वे तुम्हें सुनते हैं, जब तुम (उन्हें) पुकारते हो? قَالَ هَلْ يَسْمَعُونَكُمْ إِذْ تَدْعُونَ. ﴿72﴾
73 या तुम्हें लाभ देते हैं, या हानि पहुँचाते हैं? أَوْ يَنفَعُونَكُمْ أَوْ يَضُرُّونَ. ﴿73﴾
74 उन्होंने कहा : बल्कि हमने अपने बाप-दादा को पाया कि वे ऐसा ही करते थे। قَالُوا۟ بَلْ وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا كَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ. ﴿74﴾
75 उसने कहा : तो क्या तुमने देखा कि जिनको तुम पूजते रहे। قَالَ أَفَرَءَيْتُم مَّا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ. ﴿75﴾
76 तुम तथा तुम्हारे पहले बाप-दादा? أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُمُ ٱلْأَقْدَمُونَ. ﴿76﴾
77 सो निःसंदेह वे मेरे शत्रु हैं, सिवाय सारे संसारों के पालनहार के। فَإِنَّهُمْ عَدُوٌّۭ لِّىٓ إِلَّا رَبَّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿77﴾
78 वह जिसने मुझे पैदा किया, फिर वही मेरा मार्गदर्शन करता है। ٱلَّذِى خَلَقَنِى فَهُوَ يَهْدِينِ. ﴿78﴾
79 और वही जो मुझे खिलाता है और मुझे पिलाता है। وَٱلَّذِى هُوَ يُطْعِمُنِى وَيَسْقِينِ. ﴿79﴾
80 और जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही मुझे अच्छा करता है। وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ. ﴿80﴾
81 तथा वह जो मुझे मारेगा, फिर[14] मुझे जीवित करेगा।
[14] अर्थात प्रलय के दिन अपने कर्मों का फल भोगने के लिए।
وَٱلَّذِى يُمِيتُنِى ثُمَّ يُحْيِينِ. ﴿81﴾
82 तथा वह, जिससे मैं आशा रखता हूँ कि वह बदले के दिन मेरे पाप क्षमा कर देगा। وَٱلَّذِىٓ أَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لِى خَطِيٓـَٔتِى يَوْمَ ٱلدِّينِ. ﴿82﴾
83 ऐ मेरे पालनहार! मुझे हुक्म (धर्म का ज्ञान) प्रदान कर और मुझे नेक लोगों के साथ मिला। رَبِّ هَبْ لِى حُكْمًۭا وَأَلْحِقْنِى بِٱلصَّٰلِحِينَ. ﴿83﴾
84 और बाद में आने वालों में मुझे सच्ची ख्याति प्रदान कर। وَٱجْعَل لِّى لِسَانَ صِدْقٍۢ فِى ٱلْءَاخِرِينَ. ﴿84﴾
85 और मुझे नेमतों वाली जन्नत के वारिसों में से बना दे। وَٱجْعَلْنِى مِن وَرَثَةِ جَنَّةِ ٱلنَّعِيمِ. ﴿85﴾
86 तथा मेरे बाप को क्षमा कर दे।[15] निश्चय वह गुमराहों में से था।
[15] (देखिए : सूरतुत-तौबा, आयत : 114)
وَٱغْفِرْ لِأَبِىٓ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ. ﴿86﴾
87 तथा मुझे रुसवा न कर, जिस दिन लोग उठाए जाएँगे।[16]
[16] ह़दीस में वर्णित है कि प्रलय के दिन इबराहीम अलैहिस्सलाम अपने बाप से मिलेंगे। और कहेंगे : ऐ मेरे पालनहार! तूने मुझे वचन दिया था कि मुझे पुनः जीवित होने के दिन अपमानित नहीं करेगा। तो अल्लाह कहेगा : मैंने स्वर्ग को काफ़िरों के लिए अवैध कर दिया है। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4769)
وَلَا تُخْزِنِى يَوْمَ يُبْعَثُونَ. ﴿87﴾
88 जिस दिन न कोई धन लाभ देगा और न बेटे। يَوْمَ لَا يَنفَعُ مَالٌۭ وَلَا بَنُونَ. ﴿88﴾
89 परंतु जो अल्लाह के पास पाक-साफ़ दिल लेकर आया। إِلَّا مَنْ أَتَى ٱللَّهَ بِقَلْبٍۢ سَلِيمٍۢ. ﴿89﴾
90 और (अपने रब से) डरने वालों के लिए जन्नत निकट लाई जाएगी। وَأُزْلِفَتِ ٱلْجَنَّةُ لِلْمُتَّقِينَ. ﴿90﴾
91 तथा पथभ्रष्ट लोगों के लिए भड़कती आग प्रकट कर दी जाएगी। وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِلْغَاوِينَ. ﴿91﴾
92 तथा उनसे कहा जाएगा : कहाँ हैं वे, जिन्हें तुम पूजते थे? وَقِيلَ لَهُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ. ﴿92﴾
93 अल्लाह के सिवा। क्या वे तुम्हारी मदद करते हैं, या अपनी रक्षा करते हैं? مِن دُونِ ٱللَّهِ هَلْ يَنصُرُونَكُمْ أَوْ يَنتَصِرُونَ. ﴿93﴾
94 फिर वे और सब पथभ्रष्ट लोग उसमें औंधे मुँह फेंक दिए जाएँगे। فَكُبْكِبُوا۟ فِيهَا هُمْ وَٱلْغَاوُۥنَ. ﴿94﴾
95 और इबलीस की समस्त सेनाएँ भी। وَجُنُودُ إِبْلِيسَ أَجْمَعُونَ. ﴿95﴾
96 वे उसमें आपस में झगड़ते हुए कहेंगे : قَالُوا۟ وَهُمْ فِيهَا يَخْتَصِمُونَ. ﴿96﴾
97 अल्लाह की क़सम! निःसंदेह हम निश्चय खुली गुमराही में थे। تَٱللَّهِ إِن كُنَّا لَفِى ضَلَٰلٍۢ مُّبِينٍ. ﴿97﴾
98 जब हम तुम्हें सारे संसारों के पालनहार के बराबर ठहराते थे। إِذْ نُسَوِّيكُم بِرَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿98﴾
99 और हमें तो सिर्फ़ इन अपराधियों ने गुमराह किया। وَمَآ أَضَلَّنَآ إِلَّا ٱلْمُجْرِمُونَ. ﴿99﴾
100 अब न हमारे लिए कोई सिफारिश करने वाले हैं। فَمَا لَنَا مِن شَٰفِعِينَ. ﴿100﴾
101 और न कोई घनिष्ट मित्र। وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍۢ. ﴿101﴾
102 तो यदि वास्तव में हमारे लिए वापस जाने का अवसर होता, तो हम ईमानवालों में से हो जाते।[17]
[17] इस आयत में संकेत है कि संसार में एक ही जीवन कर्म के लिए मिलता है। और दूसरा जीवन परलोक में कर्मों के फल के लिए मिलेगा।
فَلَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةًۭ فَنَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ. ﴿102﴾
103 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे। إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ. ﴿103﴾
104 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली,[18] अत्यंत दयावान् हैl
[18] परंतु लोग स्वयं अत्याचार करके नरक के भागी बन रहे हैं।
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ. ﴿104﴾
105 नूह़ की जाति ने रसूलों को झुठलाया। كَذَّبَتْ قَوْمُ نُوحٍ ٱلْمُرْسَلِينَ. ﴿105﴾
106 जब उनसे उनके भाई नूह़ ने कहा : क्या तुम डरते नहीं? إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ نُوحٌ أَلَا تَتَّقُونَ. ﴿106﴾
107 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।[19]
[19] अल्लाह का संदेश बिना कमी और अधिकता के तुम्हें पहुँचा रहा हूँ।
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ. ﴿107﴾
108 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो। فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ. ﴿108﴾
109 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है। وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿109﴾
110 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो। فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ. ﴿110﴾
111 उन्होंने कहा : क्या हम तुझपर ईमान ले आएँ, जबकि तेरे पीछे चलने वाले अत्यंत नीच[20] लोग हैं?
[20] अर्थात धनी नहीं, निर्धन लोग कर रहे हैं।
۞ قَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ لَكَ وَٱتَّبَعَكَ ٱلْأَرْذَلُونَ. ﴿111﴾
112 (नूह़ ने) कहा : मूझे क्या मालूम कि वे क्या कर्म करते रहे हैं? قَالَ وَمَا عِلْمِى بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ. ﴿112﴾
113 उनका ह़िसाब तो मेरे पालनहार ही के ज़िम्मे है, यदि तुम समझो। إِنْ حِسَابُهُمْ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّى ۖ لَوْ تَشْعُرُونَ. ﴿113﴾
114 और मैं ईमान वालों को धुतकारने वाला[21] नहीं हूँ।
[21] अर्थात मैं हीन वर्ग के लोगों को जो ईमान लाए हैं, अपने से दूर नहीं कर सकता जैसा कि तुम चाहते हो।
وَمَآ أَنَا۠ بِطَارِدِ ٱلْمُؤْمِنِينَ. ﴿114﴾
115 मैं तो बस एक खुला डराने वाला हूँ إِنْ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ. ﴿115﴾
116 उन्होंने कहा : ऐ नूह़! यदि तू बाज़ नहीं आया, तो अवश्य संगसार किए गए लोगों में से हो जाएगा। قَالُوا۟ لَئِن لَّمْ تَنتَهِ يَٰنُوحُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمَرْجُومِينَ. ﴿116﴾
117 उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह मेरी जाति ने मुझे झुठला दिया! قَالَ رَبِّ إِنَّ قَوْمِى كَذَّبُونِ. ﴿117﴾
118 अतः तू मेरे और उनके बीच दो-टूक निर्णय कर दे, तथा मुझे और जो ईमानवाले मेरे साथ हैं, उन्हें बचा ले। فَٱفْتَحْ بَيْنِى وَبَيْنَهُمْ فَتْحًۭا وَنَجِّنِى وَمَن مَّعِىَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ. ﴿118﴾
119 तो हमने उसे और उन लोगों को जो उसके साथ भरी हुई नाव में थे, बचा लिया। فَأَنجَيْنَٰهُ وَمَن مَّعَهُۥ فِى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ. ﴿119﴾
120 फिर उसके बाद शेष लोगों को डुबो दिया। ثُمَّ أَغْرَقْنَا بَعْدُ ٱلْبَاقِينَ. ﴿120﴾
121 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे। إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ. ﴿121﴾
122 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है। وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ. ﴿122﴾
123 आद ने रसूलों को झुठलाया। كَذَّبَتْ عَادٌ ٱلْمُرْسَلِينَ. ﴿123﴾
124 जब उनसे उनके भाई हूद[22] ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
[22] आद जाति के नबी हूद (अलैहिस्सलाम) को उनका भाई कहा गया है; क्योंकि वह भी उन्हीं के समुदाय में से थे।
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ هُودٌ أَلَا تَتَّقُونَ. ﴿124﴾
125 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ। إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ. ﴿125﴾
126 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो। فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ. ﴿126﴾
127 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है। وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿127﴾
128 क्या तुम हर ऊँचे स्थान पर एक स्मारक बनाते हो? इस स्थिति में कि व्यर्थ कार्य करते हो। أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ ءَايَةًۭ تَعْبَثُونَ. ﴿128﴾
129 तथा बड़े-बड़े भवन बनाते हो, शायद कि तुम सदा जीवित रहोगे। وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمْ تَخْلُدُونَ. ﴿129﴾
130 और जब तुम पकड़ते हो, तो बड़ी निर्दयता से पकड़ते हो। وَإِذَا بَطَشْتُم بَطَشْتُمْ جَبَّارِينَ. ﴿130﴾
131 अतः अल्लाह से डरो और जो मैं कहता हूँ, उसे मानो। فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ. ﴿131﴾
132 तथा उससे डरो जिसने उन चीज़ों से तुम्हारी मदद की, जिन्हें तुम जानते हो। وَٱتَّقُوا۟ ٱلَّذِىٓ أَمَدَّكُم بِمَا تَعْلَمُونَ. ﴿132﴾
133 उसने चौपायों और बेटों से तुम्हारी मदद की। أَمَدَّكُم بِأَنْعَٰمٍۢ وَبَنِينَ. ﴿133﴾
134 तथा बाग़ों और जल स्रोताें से। وَجَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍ. ﴿134﴾
135 निश्चय ही मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ। إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ. ﴿135﴾
136 उन्होंने कहा : हमारे लिए बराबर है कि तू नसीहत करे, या नसीहत करने वालों में से हो। قَالُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْنَآ أَوَعَظْتَ أَمْ لَمْ تَكُن مِّنَ ٱلْوَٰعِظِينَ. ﴿136﴾
137 यह तो केवल पहले लोगों की आदत है।[23]
[23] अर्थात प्राचीन युग से होती चली आ रही है।
إِنْ هَٰذَآ إِلَّا خُلُقُ ٱلْأَوَّلِينَ. ﴿137﴾
138 और हम निश्चित रूप से दंडित नहीं होंगे। وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ. ﴿138﴾
139 तो उन्होंने उसे झुठला दिया, तो हमने उन्हें विनष्ट कर दिया। निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर लोग ईमानवाले नहीं थे। فَكَذَّبُوهُ فَأَهْلَكْنَٰهُمْ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ. ﴿139﴾
140 तथा निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है। وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ. ﴿140﴾
141 समूद ने रसूलों[24] को झुठलाया।
[24] यहाँ यह बात याद रखने की है कि एक रसूल का इनकार सभी रसूलों का इनकार है; क्योंकि सबका उपदेश एक ही था।
كَذَّبَتْ ثَمُودُ ٱلْمُرْسَلِينَ. ﴿141﴾
142 जब उनसे उनके भाई सालेह़ ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो? إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ صَٰلِحٌ أَلَا تَتَّقُونَ. ﴿142﴾
143 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ। إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ. ﴿143﴾
144 अतः अल्लाह से डरो और जो मैं कहता हूँ, उसका पालन करो। فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ. ﴿144﴾
145 मैं इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है। وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿145﴾
146 क्या तुम उन चीज़ों में जो यहाँ हैं, निश्चिंत छोड़ दिए जाओगे? أَتُتْرَكُونَ فِى مَا هَٰهُنَآ ءَامِنِينَ. ﴿146﴾
147 बाग़ों तथा स्रोतों में। فِى جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ. ﴿147﴾
148 तथा खेतों और खजूर के पेड़ों में, जिनके फल मुलायम और पके हुए हैं। وَزُرُوعٍۢ وَنَخْلٍۢ طَلْعُهَا هَضِيمٌۭ. ﴿148﴾
149 तथा तुम पर्वतों को काटकर बड़ी निपुणता के साथ घर बनाते हो। وَتَنْحِتُونَ مِنَ ٱلْجِبَالِ بُيُوتًۭا فَٰرِهِينَ. ﴿149﴾
150 अतः अल्लाह से डरो और मेरा आज्ञापालन करो। فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ. ﴿150﴾
151 और हद से आगे बढ़ने वालों का हुक्म न मानो। وَلَا تُطِيعُوٓا۟ أَمْرَ ٱلْمُسْرِفِينَ. ﴿151﴾
152 जो धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं और सुधार नहीं करते। ٱلَّذِينَ يُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ. ﴿152﴾
153 उन्होंने कहा : निःसंदेह तू उन लोगों में से है जिनपर प्रबल जादू किया गया है। قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مِنَ ٱلْمُسَحَّرِينَ. ﴿153﴾
154 तू तो बस हमारे ही जैसा एक मनुष्य है। अतः कोई निशानी ले आ, यदि तू सच्चों में से है। مَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا فَأْتِ بِـَٔايَةٍ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ. ﴿154﴾
155 उसने कहा : यह एक ऊँटनी[25] है। इसके लिए पानी पीने की एक बारी है और तुम्हारे लिए एक निश्चित दिन पानी पीने की बारी है।
[25] अर्थता यह ऊँटनी चमत्कार है जो उनकी माँग पर पत्थर से निकली थी।
قَالَ هَٰذِهِۦ نَاقَةٌۭ لَّهَا شِرْبٌۭ وَلَكُمْ شِرْبُ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ. ﴿155﴾
156 तथा उसे किसी बुराई से हाथ न लगाना, अन्यथा तुम्हें एक बड़े दिन की यातना पकड़ लेगी। وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوٓءٍۢ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابُ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ. ﴿156﴾
157 तो उन्होंने उसकी कूँचें काट दीं, फिर पछताने वाले हो गए। فَعَقَرُوهَا فَأَصْبَحُوا۟ نَٰدِمِينَ. ﴿157﴾
158 तो उन्हें यातना ने पकड़ लिया। निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे। فَأَخَذَهُمُ ٱلْعَذَابُ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ. ﴿158﴾
159 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है। وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ. ﴿159﴾
160 लूत की जाति ने रसूलों को झुठलाया। كَذَّبَتْ قَوْمُ لُوطٍ ٱلْمُرْسَلِينَ. ﴿160﴾
161 जब उनके भाई लूत ने उनसे कहा : क्या तुम डरते नहीं हो? إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ لُوطٌ أَلَا تَتَّقُونَ. ﴿161﴾
162 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ। إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ. ﴿162﴾
163 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो। فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ. ﴿163﴾
164 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है। وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿164﴾
165 क्या सभी संसारों में से तुम पुरुषों के पास आते[26] हो।
[26] इस कुकर्म का आरंभ संसार में लूत (अलैहिस्सलाम) की जाति से हुआ। और अब यह कुकर्म पूरे विश्व में विशेष रूप से यूरोपीय देशों में व्यापक है। और समलैंगिक विवाह को यूरोप के बहुत-से देशों में वैध मान लिया गया है। जिसके कारण कभी भी उन पर अल्लाह की यातना आ सकती है।
أَتَأْتُونَ ٱلذُّكْرَانَ مِنَ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿165﴾
166 तथा उन्हें छोड़ देते हो, जो तुम्हारे पालनहार ने तुम्हारे लिए तुम्हारी पत्नियाँ पैदा की हैं। बल्कि तुम हद से आगे बढ़ने वाले लोग हो। وَتَذَرُونَ مَا خَلَقَ لَكُمْ رَبُّكُم مِّنْ أَزْوَٰجِكُم ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ عَادُونَ. ﴿166﴾
167 उन्होंने कहा : ऐ लूत! निःसंदेह यदि तू नहीं रुका, तो निश्चित रूप से तू अवश्य निष्कासित लोगों में से हो जाएगा। قَالُوا۟ لَئِن لَّمْ تَنتَهِ يَٰلُوطُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُخْرَجِينَ. ﴿167﴾
168 उसने कहा : निःसंदेह मैं तुम्हारे काम से सख़्त घृणा करने वालों में से हूँ। قَالَ إِنِّى لِعَمَلِكُم مِّنَ ٱلْقَالِينَ. ﴿168﴾
169 ऐ मेरे पालनहार! मुझे तथा मेरे घर वालों को उससे बचा ले, जो ये करते हैं। رَبِّ نَجِّنِى وَأَهْلِى مِمَّا يَعْمَلُونَ. ﴿169﴾
170 तो हमने उसे और उसके सभी घर वालों को बचा लिया। فَنَجَّيْنَٰهُ وَأَهْلَهُۥٓ أَجْمَعِينَ. ﴿170﴾
171 सिवाय एक बुढ़िया[27] के, जो पीछे रहने वालों में से थी।
[27] इससे अभिप्रेत लूत (अलैहिस्सलाम) की काफ़िर पत्नी थी।
إِلَّا عَجُوزًۭا فِى ٱلْغَٰبِرِينَ. ﴿171﴾
172 फिर हमने दूसरों को विनष्ट कर दिया। ثُمَّ دَمَّرْنَا ٱلْءَاخَرِينَ. ﴿172﴾
173 और हमने उनपर ज़ोरदार बारिश[28] बरसाई। तो उन लोगों की बारिश बहुत बुरी थी, जिन्हें डराया गया था।
[28] अर्थात पत्थरों की बारिश। (देखिए : सूरत हूद, आयत : 82-83)
وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًۭا ۖ فَسَآءَ مَطَرُ ٱلْمُنذَرِينَ. ﴿173﴾
174 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे। إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ. ﴿174﴾
175 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है। وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ. ﴿175﴾
176 ऐका[29] वालों ने रसूलों को झुठलाया।
[29] ऐका का अर्थ झाड़ी है। यह मदयन का क्षेत्र है जिसमें शुऐब अलैहिस्सलाम को भेजा गया था।
كَذَّبَ أَصْحَٰبُ لْـَٔيْكَةِ ٱلْمُرْسَلِينَ. ﴿176﴾
177 जब उनसे शुऐब ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो? إِذْ قَالَ لَهُمْ شُعَيْبٌ أَلَا تَتَّقُونَ. ﴿177﴾
178 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ। إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ. ﴿178﴾
179 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो। فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ. ﴿179﴾
180 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है। وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿180﴾
181 नाप पूरा दो और कम देने वालों में से न बनो। ۞ أَوْفُوا۟ ٱلْكَيْلَ وَلَا تَكُونُوا۟ مِنَ ٱلْمُخْسِرِينَ. ﴿181﴾
182 और सीधे तराज़ू से तोलो। وَزِنُوا۟ بِٱلْقِسْطَاسِ ٱلْمُسْتَقِيمِ. ﴿182﴾
183 और लाेगों को उनका सामान कम न दो। और धरती में उपद्रव फैलाते मत फिरो। وَلَا تَبْخَسُوا۟ ٱلنَّاسَ أَشْيَآءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ. ﴿183﴾
184 और उससे डरो, जिसने तुम्हें तथा पहले लोगों को पैदा किया है। وَٱتَّقُوا۟ ٱلَّذِى خَلَقَكُمْ وَٱلْجِبِلَّةَ ٱلْأَوَّلِينَ. ﴿184﴾
185 उन्होंने कहा : निःसंदेह तू तो उन लोगों में से है जिनपर ताक़तवर जादू किया गया है। قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مِنَ ٱلْمُسَحَّرِينَ. ﴿185﴾
186 और तू तो बस हमारे ही जैसा एक मनुष्य[30] है और निःसंदेह हम तो तुझे झूठों में से समझते हैं।
[30] यहाँ यह बात विचारणीय है कि सभी विगत जातियों ने अपने रसूलों को उनके मानव होने के कारण नकार दिया। और जिसने स्वीकार भी किया, तो उसने कुछ युग बीतने के पश्चात् अतिशयोक्ति करके अपने रसूलों को प्रभु अथवा प्रभु का अंश बना कर उन्हीं को पूज्य बना लिया। तथा एकेश्वरवाद को कड़ा आघात पहुँचाकर मिश्रणवाद का द्वार खोल लिया और कुपथ हो गए। वर्तमान युग में भी इसी का प्रचलन है और इसका आधार अपने पूर्वजों की रीतियों को बनाया जाता है। इस्लाम इसी कुपथ का निवारण करके एकेश्वरवाद की स्थापना के लिए आया है और वास्तव में यही सत्धर्म है। ह़दीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : मूझे वैसे न बढ़ाओ जैसे ईसाइयों ने मरयम के पुत्र (ईसा) को बढ़ा दिया। निःसंदेह मैं उसका दास हूँ। अतः मुझे अल्लाह का दास और उसका रसूल कहो। (देखिए : सह़ीह़ बुख़ारी : 3445)
وَمَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا وَإِن نَّظُنُّكَ لَمِنَ ٱلْكَٰذِبِينَ. ﴿186﴾
187 तो हम पर आसमान से कुछ टुकड़े गिरा दे, यदि तू सच्चों में से है। فَأَسْقِطْ عَلَيْنَا كِسَفًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ. ﴿187﴾
188 उसने कहा : मेरा पालनहार अधिक जानने वाला है जो कुछ तुम कर रहे हो। قَالَ رَبِّىٓ أَعْلَمُ بِمَا تَعْمَلُونَ. ﴿188﴾
189 चुनाँचे उन्होंने उसे झुठला दिया। तो उन्हें छाया[31] के दिन की यातना ने पकड़ लिया। निश्चय वह एक बड़े दिन की यातना थी।
[31] अर्थात उनकी यातना के दिन उनपर बादल छा गया। फिर आग बरसने लगी और धरती कंपित हो गई। फिर एक कड़ी ध्वनि ने उनकी जानें ले लीं। (इब्ने कसीर)
فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمْ عَذَابُ يَوْمِ ٱلظُّلَّةِ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ. ﴿189﴾
190 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे। إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ. ﴿190﴾
191 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है। وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ. ﴿191﴾
192 तथा निःसंदेह, यह (क़ुरआन) निश्चय सारे संसारों के पालनहार का उतारा हुआ है। وَإِنَّهُۥ لَتَنزِيلُ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿192﴾
193 इसे रूह़ुल-अमीन[32] (अत्यंत विश्वसनीय फ़रिश्ता) लेकर उतरा है।
[32] रूह़ुल-अमीन से अभिप्राय आदरणीय फ़रिश्ता जिबरीलल (अलैहिस्सलाम) हैं, जो मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अल्लाह की ओर से वह़्य लेकर उतरते थे, जिसके कारण आप रसूलों की और उनकी जातियों की दशा से अवगत हुए। अतः यह आपके सत्य रसूल होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
نَزَلَ بِهِ ٱلرُّوحُ ٱلْأَمِينُ. ﴿193﴾
194 आपके दिल पर, ताकि आप सावधान करने वालों में से हो जाएँ। عَلَىٰ قَلْبِكَ لِتَكُونَ مِنَ ٱلْمُنذِرِينَ. ﴿194﴾
195 स्पष्ट अरबी भाषा में। بِلِسَانٍ عَرَبِىٍّۢ مُّبِينٍۢ. ﴿195﴾
196 तथा निःसंदेह यह निश्चित रूप से पहले लोगों की पुस्तकों में मौजूद है।[33]
[33] अर्थात सभी आकाशीय ग्रंथों में अंतिम नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आगमन तथा आपपर पुस्तक क़ुरआन के अवतरित होने की भविष्वाणी की गई है। और सब नबियों ने इसकी शुभ-सूचना दी है।
وَإِنَّهُۥ لَفِى زُبُرِ ٱلْأَوَّلِينَ. ﴿196﴾
197 क्या उनके लिए यह एक निशानी न थी है कि इसे बनी इसराईल के विद्वान[34] जानते हैं।
[34] बनी इसराईल के विद्वान अब्दुल्लाह बिन सलाम आदि, जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और क़ुरआन पर ईमान लाए, वे इसके सत्य होने का खुला प्रमाण हैं।
أَوَلَمْ يَكُن لَّهُمْ ءَايَةً أَن يَعْلَمَهُۥ عُلَمَٰٓؤُا۟ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ. ﴿197﴾
198 और यदि हम इसे ग़ैर-अरब[35] लोगों में से किसी पर उतार देते।
[35] अर्थात ऐसे व्यक्ति पर जो अरब देश और जाति के अतिरिक्त किसी अन्य जाति का हो।
وَلَوْ نَزَّلْنَٰهُ عَلَىٰ بَعْضِ ٱلْأَعْجَمِينَ. ﴿198﴾
199 फिर वह इसे उनके सामने पढ़ता, तो भी वे उसपर ईमान लाने वाले न होते।[36]
[36] अर्थात अरबी भाषा में न होता, तो कहते कि यह हमारी समझ में नहीं आता। (देखिए : सूरत ह़ा, मीम, सजदा, आयत : 44)
فَقَرَأَهُۥ عَلَيْهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ مُؤْمِنِينَ. ﴿199﴾
200 इसी प्रकार हमने इसे अपराधियों के हृदयों में प्रवेश कर दिया। كَذَٰلِكَ سَلَكْنَٰهُ فِى قُلُوبِ ٱلْمُجْرِمِينَ. ﴿200﴾
201 वे उसपर ईमान नहीं लाएँगे, यहाँ तक कि वे दर्दनाक यातना देख लें। لَا يُؤْمِنُونَ بِهِۦ حَتَّىٰ يَرَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ. ﴿201﴾
202 तो वह उनपर अचानक आ पड़े और वे सोचते भी न हों। فَيَأْتِيَهُم بَغْتَةًۭ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ. ﴿202﴾
203 फिर वे कहें : क्या हम मोहलत दिए जाने वाले हैं فَيَقُولُوا۟ هَلْ نَحْنُ مُنظَرُونَ. ﴿203﴾
204 तो क्या वे हमारी यातना के लिए जल्दी मचा रहे हैं? أَفَبِعَذَابِنَا يَسْتَعْجِلُونَ. ﴿204﴾
205 तो क्या आपने विचार किया यदि हम इन्हें कुछ वर्षों तक लाभ दें। أَفَرَءَيْتَ إِن مَّتَّعْنَٰهُمْ سِنِينَ. ﴿205﴾
206 फिर उनपर वह (यातना) आ जाए, जिसका उनसे वादा किया जाता था। ثُمَّ جَآءَهُم مَّا كَانُوا۟ يُوعَدُونَ. ﴿206﴾
207 तो उन्हें जो लाभ दिया जाता था, वह उनके किस काम आएगा? مَآ أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يُمَتَّعُونَ. ﴿207﴾
208 और हमने किसी बस्ती को विनष्ट नहीं किया, परंतु उसके लिए कई सावधान करने वाले थे। وَمَآ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا لَهَا مُنذِرُونَ. ﴿208﴾
209 याद दिलाने के लिए। और हम अत्याचारी नहीं थे। ذِكْرَىٰ وَمَا كُنَّا ظَٰلِمِينَ. ﴿209﴾
210 तथा इस (क़ुरआन) को लेकर शैतान नहीं उतरे। وَمَا تَنَزَّلَتْ بِهِ ٱلشَّيَٰطِينُ. ﴿210﴾
211 और न यह उनके योग्य है, और न वे ऐसा कर सकते हैं। وَمَا يَنۢبَغِى لَهُمْ وَمَا يَسْتَطِيعُونَ. ﴿211﴾
212 निःसंदेह वे तो (इसके) सुनने ही से अलग[37] कर दिए गए हैं।
[37] अर्थात इसके अवतरित होने के समय शैतान आकाश की ओर जाते हैं तो उल्का उन्हें भस्म कर देते हैं।
إِنَّهُمْ عَنِ ٱلسَّمْعِ لَمَعْزُولُونَ. ﴿212﴾
213 अतः आप अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को न पुकारें, अन्यथा आप दंड पाने वालों में हो जाएँगे। فَلَا تَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ فَتَكُونَ مِنَ ٱلْمُعَذَّبِينَ. ﴿213﴾
214 और आप अपने निकटतम रिश्तेदारों को डराएँ।[38]
[38] आदरणीय इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि जब यह आयत उतरी तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सफ़ा पर्वत पर चढ़े। और क़ुरैश के परिवारों को पुकरा। और जब सब एकत्र हो गए, और जो स्वयं नहीं आ सका तो उसने किसी प्रतिनिधि को भेज दिया। और अबू लहब तथा क़ुरैश आ गए तो आपने फरमाया : यदि मैं तुमसे कहूँ कि उस वादी में एक सेना है जो तुम पर आक्रमण करने वाली है, तो क्या तुम मुझे सच्चा मानोगे? सबने कहा : हाँ। हमने आपको सदा ही सच्चा पाया है। आपने कहा : मैं तुम्हें आगामी कड़ी यातना से सावधान कर रहा हूँ। इसपर अबू लहब ने कहा : तेरा पूरे दिन नाश हो! क्या हमें इसी के लिए एकत्र किया है? और इसीपर सूरत लह्ब उतरी। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4770)
وَأَنذِرْ عَشِيرَتَكَ ٱلْأَقْرَبِينَ. ﴿214﴾
215 और ईमान वालों में से जो आपका अनुसरण करे, उसके लिए अपना बाज़ू[39] झुका दें।
[39] अर्थात उसके साथ विनम्रता का व्यवहार करें।
وَٱخْفِضْ جَنَاحَكَ لِمَنِ ٱتَّبَعَكَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ. ﴿215﴾
216 फि यदि वे आपकी अवज्ञा करें, तो आप कह दें कि तुम जो कुछ कर रहे हो उसकी ज़िम्मेदारी से मैं बरी हूँ। فَإِنْ عَصَوْكَ فَقُلْ إِنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تَعْمَلُونَ. ﴿216﴾
217 तथा उस सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् पर भरोसा करें। وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱلْعَزِيزِ ٱلرَّحِيمِ. ﴿217﴾
218 जो आपको देखता है, जब आप खड़े होते हैं। ٱلَّذِى يَرَىٰكَ حِينَ تَقُومُ. ﴿218﴾
219 और सजदा करने वालों में आपके फिरने को भी।[40]
[40] अर्थात प्रत्येक समय, अकेले हों या लोगों के बीच हों।
وَتَقَلُّبَكَ فِى ٱلسَّٰجِدِينَ. ﴿219﴾
220 निःसंदेह वही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है। إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ. ﴿220﴾
221 क्या मैं आपको बताऊँ कि शैतान किस पर उतरते हैं? هَلْ أُنَبِّئُكُمْ عَلَىٰ مَن تَنَزَّلُ ٱلشَّيَٰطِينُ. ﴿221﴾
222 वे हर बड़े झूठे और बड़े पापी[41] पर उतरते हैं।
[41] ह़दीस में है कि फ़रिश्ते बादल में उतरते हैं, और आकाश में होने वाले निर्णय की बात करते हैं, जिसे शैतान चोरी से सुन लेते हैं। और ज्योतिषियों को पहुँचा देते हैं। फिर वह उसमें सौ झूठ मिलाते हैं। (सह़ीह़ बुख़ारी : 3210)
تَنَزَّلُ عَلَىٰ كُلِّ أَفَّاكٍ أَثِيمٍۢ. ﴿222﴾
223 वे सुनी हुई बात को (काहिनों तक) पहुँचा देते हैं, और उनमें से अधिकतर झूठे हैं। يُلْقُونَ ٱلسَّمْعَ وَأَكْثَرُهُمْ كَٰذِبُونَ. ﴿223﴾
224 और कवि लोग, उनके पीछे भटके हुए लोग ही चलते हैं। وَٱلشُّعَرَآءُ يَتَّبِعُهُمُ ٱلْغَاوُۥنَ. ﴿224﴾
225 क्या आपने नहीं देखा कि वे प्रत्येक वादी में भटकते फिरते[42] हैं।
[42] अर्थात कल्पना की उड़ान में रहते हैं।
أَلَمْ تَرَ أَنَّهُمْ فِى كُلِّ وَادٍۢ يَهِيمُونَ. ﴿225﴾
226 और यह कि निःसंदेह ऐसी बात कहते हैं, जो करते नहीं। وَأَنَّهُمْ يَقُولُونَ مَا لَا يَفْعَلُونَ. ﴿226﴾
227 सिवाय उन (कवियों) के, जो[43] ईमान लाए, और अच्छे कर्म किए और अल्लाह को बहुत याद किया तथा बदला लिया, इसके बाद कि उनके ऊपर ज़ुल्म किया गया। तथा वे लोग, जिन्होंने अत्याचार किया, शीघ्र ही जान लेंगे कि वे किस जगह लौटकर जाएँगे।
[43] इनसे अभिप्रेत ह़स्सान बिन साबित आदि कवि हैं, जो क़ुरैश के कवियों की भर्त्सना किया करते थे। (देखिए : सह़ीह़ बुख़ारी : 4124)
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَذَكَرُوا۟ ٱللَّهَ كَثِيرًۭا وَٱنتَصَرُوا۟ مِنۢ بَعْدِ مَا ظُلِمُوا۟ ۗ وَسَيَعْلَمُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ أَىَّ مُنقَلَبٍۢ يَنقَلِبُونَ. ﴿227﴾