Loading date... | Loading Hijri date... | Loading time...

التكوير

हिन्दी Translation with Arabic Quran Text

हिन्दी العربية
1 जब सूर्य लपेट दिया जाएगा। إِذَا ٱلشَّمْسُ كُوِّرَتْ. ﴿1﴾
2 और जब सितारे प्रकाश रहित हो जाएँगे। وَإِذَا ٱلنُّجُومُ ٱنكَدَرَتْ. ﴿2﴾
3 और जब पर्वत चलाए जाएँगे। وَإِذَا ٱلْجِبَالُ سُيِّرَتْ. ﴿3﴾
4 और जब गाभिन ऊँटनियाँ छोड़ दी जाएँगी। وَإِذَا ٱلْعِشَارُ عُطِّلَتْ. ﴿4﴾
5 और जब जंगली जानवर एकत्रित किए जाएँगे। وَإِذَا ٱلْوُحُوشُ حُشِرَتْ. ﴿5﴾
6 और जब सागर भड़काए जाएँगे।[1]
[1] (1-6) इनमें प्रलय के प्रथम चरण में ब्रह्मांड में जो उथल-पुथल होगी, उसको दिखाया गया है कि आकाश, धरती और पर्वत, सागर तथा जीव जंतुओं की क्या दशा होगी। और माया मोह में पड़ा इनसान इसी संसार में अपने प्रियवर धन से कैसा बेपरवाह हो जाएगा। वन पशु भी भय के मारे एकत्र हो जाएँगे। सागरों के जल-प्लावन से धरती पर जल ही जल दिखाई देगा।
وَإِذَا ٱلْبِحَارُ سُجِّرَتْ. ﴿6﴾
7 और जब प्राण मिला दिए जाएँगे। وَإِذَا ٱلنُّفُوسُ زُوِّجَتْ. ﴿7﴾
8 और जब जीवित गाड़ी गई लड़की से पूछा जाएगा। وَإِذَا ٱلْمَوْءُۥدَةُ سُئِلَتْ. ﴿8﴾
9 कि वह किस अपराध के कारण मारी गई? بِأَىِّ ذَنۢبٍۢ قُتِلَتْ. ﴿9﴾
10 तथा जब कर्मपत्र (आमाल नामे) फैला दिए जाएँगे। وَإِذَا ٱلصُّحُفُ نُشِرَتْ. ﴿10﴾
11 और जब आकाश उधेड़ दिया जाएगा। وَإِذَا ٱلسَّمَآءُ كُشِطَتْ. ﴿11﴾
12 और जब जहन्नम दहकाई जाएगी। وَإِذَا ٱلْجَحِيمُ سُعِّرَتْ. ﴿12﴾
13 और जब जन्नत क़रीब लाई जाएगी। وَإِذَا ٱلْجَنَّةُ أُزْلِفَتْ. ﴿13﴾
14 तो प्रत्येक प्राणी जान लेगा कि वह क्या लेकर आया है।[2]
[2] (7-14) इन आयतों में प्रलय के दूसरे चरण की दशा को दर्शाया गया है कि इनसानों की आस्था और कर्मों के अनुसार श्रेणियाँ बनेंगी। नृशंसितों (मज़लूमों) के साथ न्याय किया जाएगा। कर्म-पत्र खोल दिए जाएँगे। नरक भड़काई जाएगी। स्वर्ग सामने कर दिया जाएगा। और उस समय सभी को वास्तविकता का ज्ञान हो जाएगा। इस्लाम के उदय के समय अरब में कुछ लोग पुत्रियों को जन्म लेते ही जीवित गाड़ दिया करते थे। इस्लाम ने नारियों को जीवन प्रदान किया। और उन्हें जीवित गाड़ देने को घोर अपराध घोषित किया। आयत संख्या 8 में उन्हीं नृशंस अपराधियों को धिक्कारा गया है।
عَلِمَتْ نَفْسٌۭ مَّآ أَحْضَرَتْ. ﴿14﴾
15 मैं क़सम खाता हूँ पीछे हटने वाले सितारों की। فَلَآ أُقْسِمُ بِٱلْخُنَّسِ. ﴿15﴾
16 चलने वाले, छिप जाने वाले तारों की। ٱلْجَوَارِ ٱلْكُنَّسِ. ﴿16﴾
17 और रात की (क़सम), जब वह आती और जाती है। وَٱلَّيْلِ إِذَا عَسْعَسَ. ﴿17﴾
18 तथा सुबह की, जब वह रौशन होने लगे। وَٱلصُّبْحِ إِذَا تَنَفَّسَ. ﴿18﴾
19 निःसंदेह यह (क़ुरआन) एक आदरणीय संदेशवाहक की लाई हुई वाणी है। إِنَّهُۥ لَقَوْلُ رَسُولٍۢ كَرِيمٍۢ. ﴿19﴾
20 जो शक्तिशाली है, अर्श (सिंहासन) वाले के पास उच्च पद वाला है। ذِى قُوَّةٍ عِندَ ذِى ٱلْعَرْشِ مَكِينٍۢ. ﴿20﴾
21 उसकी वहाँ (आसमानों में) बात मानी जाती है और बड़ा विश्वसनीय है।[3]
[3] (15-21) तारों की व्यवस्था गति तथा अँधेरे के पश्चात् नियमित रूप से उजाला की शपथ इस बात की गवाही है कि क़ुरआन ज्योतिष की बकवास नहीं। बल्कि यह ईश-वाणी है। जिसको एक शक्तिशाली तथा सम्मान वाला फ़रिश्ता लेकर मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया। और अमानतदारी से इसे पहुँचाया।
مُّطَاعٍۢ ثَمَّ أَمِينٍۢ. ﴿21﴾
22 और तुम्हारा साथी कोई दीवाना नहीं हैं। وَمَا صَاحِبُكُم بِمَجْنُونٍۢ. ﴿22﴾
23 और निश्चय उन्होंने उस (जिबरील) को स्पष्ट क्षितिज पर देखा है। وَلَقَدْ رَءَاهُ بِٱلْأُفُقِ ٱلْمُبِينِ. ﴿23﴾
24 और वह परोक्ष (ग़ैब) की बातें बताने में कृपण नहीं हैं।[4]
[4] (22-24) इनमें यह चेतावनी दी गई है कि महा ईशदूत (मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जो सुना रहे हैं, और जो फ़रिश्ता वह़्य (प्रकाशना) लाता है, उन्होंने उसे देखा है। वह परोक्ष की बातें प्रस्तुत कर रहे हैं, कोई ज्योतिष की बात नहीं, जो धिक्कारे शौतान ज्योतिषियों को दिया करते हैं।
وَمَا هُوَ عَلَى ٱلْغَيْبِ بِضَنِينٍۢ. ﴿24﴾
25 और यह (क़ुरआन) किसी धिक्कारे हुए शैतान की वाणी नहीं है। وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَيْطَٰنٍۢ رَّجِيمٍۢ. ﴿25﴾
26 फिर तुम कहाँ जा रहे हो? فَأَيْنَ تَذْهَبُونَ. ﴿26﴾
27 यह तो समस्त संसार वालों के लिए एक उपदेश है। إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ لِّلْعَٰلَمِينَ. ﴿27﴾
28 उसके लिए, जो तुममें से सीधे मार्ग पर चलना चाहे। لِمَن شَآءَ مِنكُمْ أَن يَسْتَقِيمَ. ﴿28﴾
29 तथा तुम कुछ नहीं चाह सकते, सिवाय इसके कि सर्व संसार का पालनहार अल्लाह चाहे।[5]
[5] (27-29) इन साक्ष्यों के पश्चात सावधान किया गया है कि क़ुरआन मात्र याद-दहानी है। इस विश्व में इसके सत्य होने के सभी लक्षण सबके सामने हैं। इनका अध्ययन करके स्वयं सत्य की राह अपना लो, अन्यथा अपना ही बिगाड़ोगे।
وَمَا تَشَآءُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلْعَٰلَمِينَ. ﴿29﴾